


कोतबा–बागबहार | 13 जनवरी 2026
कोतबा–बागबहार क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना के नाम पर एक ऐसा गंभीर घोटाला उजागर हुआ है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा दिया है। मामला सिर्फ अवैध निर्माण का नहीं, बल्कि न्यायालय के स्थगन आदेशों की खुलेआम अवहेलना और दूसरे की निजी भूमि पर सरकारी आवास खड़ा करने का है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिस भूमि पर पीएम आवास का निर्माण किया जा रहा है, वह भूमि किसी अन्य व्यक्ति की निजी संपत्ति है। इस मामले को लेकर तहसीलदार न्यायालय बागबहार द्वारा पहले ही दिनांक 12 जनवरी 2024 को स्थगन आदेश जारी किया गया था। इसके बावजूद जब निर्माण नहीं रुका, तो न्यायालय ने पुनः 12 जून 2026 को भी स्थगन आदेश जारी किया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि दो-दो स्थगन आदेशों के बाद भी निर्माण धड़ल्ले से जारी है, जो सीधे-सीधे न्यायपालिका की अवमानना के दायरे में आता है।
पीड़ित भूमि मालिक का आरोप है कि उसकी बिना अनुमति और सहमति उसकी जमीन पर जबरन निर्माण कराया जा रहा है। उसने कई बार प्रशासन और जनपद पंचायत में शिकायतें दीं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं इस अवैध निर्माण को प्रशासनिक संरक्षण तो नहीं मिल रहा।
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ, जब सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत जनपद पंचायत पत्थलगांव से पीएम आवास योजना से संबंधित दस्तावेज मांगे गए। नक्शा, खसरा, बी-1 और शपथ पत्र जैसी महत्वपूर्ण जमीन संबंधी जानकारियों की सत्यापित प्रतियां मांगी गई थीं, लेकिन जनपद पंचायत ने दिनांक 12 अगस्त 2024 को लिखित जवाब देते हुए साफ कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना में हितग्राही से भूमि संबंधी दस्तावेज लिए ही नहीं जाते।
इस जवाब ने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी है। सवाल यह है कि बिना जमीन के कागजात देखे आखिर आवास किस आधार पर स्वीकृत किए जा रहे हैं? अगर कोई व्यक्ति किसी और की जमीन पर दावा कर दे, तो क्या वहां भी सरकारी आवास बनवा दिया जाएगा? यह न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि भविष्य में हजारों भूमि विवादों को जन्म देने वाला खतरनाक चलन भी है।
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों में इस मामले को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि अगर न्यायालय के आदेशों की भी कोई अहमियत नहीं रह गई है, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करे? उन्होंने मांग की है कि निर्माण कार्य को तुरंत रोका जाए, पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, तथा जिन अधिकारियों और कर्मचारियों ने आंख मूंदकर यह अवैध निर्माण होने दिया, उन पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
साथ ही यह भी मांग उठ रही है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत भूमि स्वामित्व की जांच को अनिवार्य किया जाए, ताकि किसी गरीब के नाम पर किसी और की जमीन हड़पने का खेल बंद हो सके।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला प्रशासन इस गंभीर मामले में क्या कदम उठाता है? क्या न्यायालय के आदेशों का सम्मान होगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा? कोतबा–बागबहार की जनता अब जवाब चाहती है, और पूरे जिले की नजरें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
